Spirtual Awareness

पिसी माँ

Devotee of Gaura Nitai

पश्चिम बंगाल के सिउड़ी जिले में रामपुर नामक एक ग्राम था। वहाँ निताई-गौर का एक प्राचीन मन्दिर था। एक बार प्राकृतिक प्रकोप के कारण सभी ग्राम छोड़कर चले गए। कुछ ही दिनों में ग्राम ने जंगल का रूप ले लिया। निताई-गौर का मन्दिर ध्वंस हो गया और श्री विग्रह मलबे में दब गए। कुछ वर्ष बाद एक ग्वाले ने, जो वहाँ नित्य गायें चराने जाया करता था, देखा कि उसकी गायों में से जो सबसे अधिक दूध देती है, वह एक निश्चित स्थान पर खड़ी होकर रोज़ थन से दूध टपकाया करती है। स्थानीय लोगों ने कौतुहल वश उस स्थान की खुदाई की तो निताई-गौर के श्रीविग्रह निकले।
सिउड़ी के लोगों ने श्रीमूर्तियों का अभिषेक कराकर उनकी स्थापना की और बलराम दास बाबा जी उन मूर्तियों की सेवा करने लगे।
श्रीमती चन्द्रशशी गोस्वामी डेला ग्राम के प्रसिद्ध और धनी मुखोपाध्याय वंश की कुलवधू थीं। ज़मींदारी के काम से सिउड़ी आईं थीं। गौर-निताई के मन्दिर के निकट एक मकान लेकर रहने लगीं। नित्य प्रति बाल रूप गौर-निताई की मनोहर मूर्तियों के दर्शन करतीं और एक मन दूध की खीर का भोग लगातीं। एक बार उन्होंने स्वप्न में देखा कि गौर-निताई दोनों भाई उनसे कह रहें हैं- ‘माँ! हमें बड़ी भूख लगी है। तू अपने हाथ से खीर पकाकर खिला।’
वैष्णव-शास्त्रों के अनुसार किसी अदीक्षित व्यक्ति द्वारा ठाकुर की रसोई नहीं बनायी जा सकती। इसलिए स्वप्नादेश होने पर चन्दशशीदेवी ने श्री बलराम दास बाबा से पहले दीक्षा ली और फिर हाथ से खीर पकाकर गौर-निताई को भोग लगाया। अब चन्द्रशशीदेवी को वापिस जाना था, उसी रात उन्होंने देखा कि दोनों बालक उनके पास आकर उनका आँचल पकड़कर कह रहे हैं- ‘माँ! तुम जाओ नहीं। तुम चली जाओगी तो हमें खीर कौन खिलाया करेगा? तुम हमारी माँ हो, हम तुम्हें जाने नहीं देंगे।’ चन्द्रशशीदेवी ने प्यार से उनसे आँचल छोड़ने को कहा, पर गौर-निताई ने नहीं छोड़ा और आँचल फट गया। उसका एक टुकड़ा गौर के हाथ में रह गया। चन्द्रशशीदेवी की निद्रा भंग हुई तो देखा सचमुच उनके आँचल का कोना फटा हुआ है। उसी समय उन्होंने बलरामदास बाबा को सब वृतान्त सुनाया। बाबा ने तुरंत जाकर मंन्दिर का द्वार खोला और जाकर श्री विग्रह को जगाया तो आश्चर्य चकित रह गए। वास्तव में गौर के हाथ में आँचल का फटा हुआ अंश था।

 

चन्द्रशशी देवी ने अपने घर जाने का विचार सदा के लिए त्याग दिया और धन, सम्पत्ति, आत्मीय स्वजनों का मोह भी छोड़ दिया। मन्दिर में रहकर अपने प्राणधन गौर-निताई की सेवा करने लगीं। उनकी आयु इस समय 20 वर्ष की थी। मन्दिर में बाबा जी के साथ रहने के कारण कुछ ही समय बाद लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। जिससे चन्द्रशशीदेवी को असाध्य दुःख हुआ। वह अपने दुःख की बात गौर-निताई से कहते-कहते सो गईं। स्वप्न में गौर-निताई ने उनके गले में अपनी बाहें डालते हुए कहा- ‘माँ! तुम हमें वृन्दावन ले चलो।’

 

शीघ्र चन्द्रशशीदेवी और बलराम दास बाबा गाँव छोड़ गौर-निताई को लेकर वृन्दावन पहुँचे। वहाँ एक भक्तिमती महिला उन्हें अपने घर ले आई और निताई-गौर के सेवा कार्य में सहायता करने लगी। मोहल्ले के लोग उस भक्त महिला को पिसी माँ (बूआजी) कहकर पुकारते थे इसीलिए चन्द्रशशीदेवी को भी सब लोग ‘‘पिसी माँ’’ कहकर पुकारने लगे।

 

एक दिन निताई-गौर के लिए रसोई करते-करते पिसी माँ को मासिक स्त्री धर्म के चिन्ह दिखाई पड़े। वे रसोई घर से बाहर जाकर आँगन में लेट गईं और निताई-गौर की ओर देख-देखकर अश्रु प्रवाहित करने लगीं। वह सोचने लगी- आज मैं अपने हाथ से निताई-गौर को भोग न लगा सकूँगी। यही सोचते-सोचते उन्हें नींद लग गई और उन्होंने स्वप्न में देखा कि निताई-गौर ने उनके निकट आकर कहा- ‘‘माँ! दुःख की कोई बात नहीं। तुम हमारी माँ हो। तुम वही करो जो एक माँ को अपने बच्चे के लिए करना चाहिए। अब उठो और स्नान करके हमें खाने को दो। बड़ी भूख लगी है। अब से तुम इस रोग से मुक्त हो जाओगी।’’ पिसी माँ ने आदेशानुसार कार्य किया। उसके बाद उन्हें कभी मासिक धर्म नहीं हुआ।

 

वृन्दावन आने के पश्चात् कौतुकी निताई-गौर भाँति-भाँति की लीला कर पिसी माँ और अन्य भक्तों को सुखी करने लगे। उन्हें यदि कभी किसी वस्तु की आवश्यकता होती तो कहीं न कहीं से माँगकर उसकी पूर्ति कर लेते। गौर-निताई के पास खड़ाऊँ नहीं थीं। माँ से कहते तो वे कहतीं- ‘खड़ाऊँ का क्या करोगे? तुम्हें कहाँ आनाजाना रहता है?’ इसलिए वे किसी दूसरे की बाँट देखते रहे। बंगाली परिवार की एक महिला उन्हीं दिनों झूलन के दर्शन करने वृन्दावन आईं हुई थीं और चिड़ियाकुंज में रह रही थीं। एक दिन जब तीसरे पहर बारिश हो रही थी। बरामदे में बैठी पिसी माँ एक हाथ से निताई-गौर को पंखा झल रही थीं और दूसरे हाथ से माला जप रही थीं। पिसी माँ को अचानक तन्द्रा आ गयी। उसी समय उन्होंने देखा कि निताई-गौर मन्दिर से निकलकर गीले आँगन में उतर गए। पिसी माँ चीख पड़ीं- ओरे निताई-गौर! कहाँ जा रहे हो भीगते-भीगते? सर्दी हो जाएगी।’ पिसी माँ की निंद्रा टूट गई। उन्हें लगा कि उन्होनें स्वप्न देखा है अतः फिर से पंखा झलने लगीं और सो गईं। मौका पाते ही निताई-गौर चिड़ियाकुंज में जा पहुँचे और उस बंगाली महिला के सिरहाने जाकर बैठ गए। उस समय वह सो रही थीं। उन्होंने उसका सिर हिलाते हुए कहा- ‘‘यहाँ सोने आयी है? उठ।’ स्वप्नावस्था में वह बोली-‘‘कौन हो तुम? ’’
निताई-गौर :- ‘हमारा नाम निताई-गौर है। हम वानखण्डी की पिसी माँ के बेटे हैं।’
भक्त: तुम पिसी माँ के बेटे? ‘किस प्रकार सम्भव है?’
निताई-गौर :- मोहल्ले के लोग हमें पिसी माँ के बेटे कहते हैं।
भक्त :- तो तुम यहाँ कैसे?
निताई-गौर :- हमारे पास खड़ाऊँ नहीं हैं। देखो हमारे पैर कीचड़ में कैसे सन रहे हैं।
महिला निताई-गौर का रूप देखकर मुग्ध हो गईं। निद्राभंग होने पर दोनों बालकों का स्मरण कर रोने लगीं। रोते-रोते वह घर से निकलीं और पथ में जिसे देखतीं उससे पूछतीं- ‘‘पिसी माँ के बेटे निताई-गौर का घर कहाँ है? एक ब्रजवासी ने निताई-गौर का मन्दिर दिखा दिया। महिला ने मन्दिर में प्रवेश किया।
पिसी माँ उस समय पंखा झल रही थीं। महिला ने उनसे पूछा- यह क्या निताई-गौर की पिसी माँ का घर है?
‘हाँ माँ! यह पिसी माँ के बेटे निताई-गौर का घर है। ’पिसी माँ ने उत्तर दिया और पूछा- ‘‘तुम रो क्यों रही हो माँ?‘‘
’तुम्हारे दोनों बेटे कहाँ हैं? मैं उन्हें देखना चाहती हूँ।’ महिला ने विनयपूर्वक कहा।
पिसी माँ ने महिला को आदरपूर्वक बैठाकर मन्दिर का द्वार खोल दिया। अपने स्वप्न के निताई-गौर के दर्शन कर महिला के प्राण रो दिए। वह बड़ी देर तक मूर्छित अवस्था में भूमि पर पड़ी रहीं।

महिला ने चाँदी के खड़ाऊँ बनवाकर निताई-गौर को भेंट की। आज भी वह खड़ाऊँ मन्दिर में सुरक्षित है।
प्रसन्नदासी नाम की एक महिला वृन्दावन में निवास करती थीं। उन्होंने एक दिन स्वप्न में देखा कि निताई-गौर उसके सम्मुख आये हैं और कह रहे हैं- ‘देख हमारे पास सब आभूषण हैं, पर नूपुर नहीं है। हमें नूपुर दे।’ निद्रा भंग होने पर प्रसन्नदासी पिसी माँ के पास गयीं और प्रेमाश्रु बहाते हुए स्वप्नका वृतान्त कहा। सोने के नूपुर गौर-निताई को पहनाकर वह कृतार्थ हुईं।

 

कुछ दिनों से निताई-गौर के एक प्रिय सेवक उनकी सेवा में पिसी माँ का हाथ बटाया करते थे। एक दिन उनके मन में कुवासना जाग गई। उन्होंने गौर-निताई के आभूषण चुरा लिए। गौर-निताई को बिना आभूषणों के देख पिसी माँ को बहुत दुःख हुआ। चिन्तित होकर उन्होंने गौर-निताई से पूछा-‘बोलो न रे! तुम्हारे गहने कौन ले गया?’

 

उत्तर में दोनों कहने लगे- ‘‘माँ! वह वैष्णव बड़ा दरिद्र है। हमें उसने खूब रबड़ी खिलाई है। अलंकार हमने उसे दे दिये। उससे कुछ कहना मत।’

 

माँ ने हँसकर कहा- ‘ठीक है! तुम्हारी वस्तु तुम किसी को दे दो या रखो। मेरा उसमें क्या? तुम्हें ज़रूरत होगी तो फिर कहीं से माँग लाओगे। माँगने में तुम्हें लज्जा तो है नहीं। ब्राह्मणी के बेटे जो हो।’ ये है भगवान् की भक्तवत्सलता।

 

इसी प्रकार निताई-गौर की सेवा करते-करते पिसी माँ 100 वर्ष की हो गईं। अभी तक वे नित्य तीन बार स्नान करके निताई-गौर की सेवा करतीं पर अब यह उनके लिए कठिन हो गया। पिसी माँ ने गोपेश्वर गोस्वामी को प्रभु की सेवा में नियुक्त किया। गोपेश्वर गोस्वामी सेवा की परिपाटी से अनभिज्ञ थे। पिसी माँ गौर-निताई को शीतकाल में गरम जल से स्नान कराती थीं। गोपेश्वर गोस्वामी ने प्रारम्भ में एक दिन उन्हें ठण्डे जल से स्नान करा दिया। उन्हें सर्दी हो गई, नाक बहने लगी। गोपेश्वर गोस्वामी को पता ही नहीं चला। निताई-गौर ने दुःखी होकर अपनी माँ को याद किया और पुकारा। माँ अब अधिकतर मन्दिर के दूसरे मंजिल पर रहने लगीं थी। पर बच्चों की पुकार पर वह भागी चलीं आईं। नीचे आकर देखा तो दोनों बच्चों की नाक लाल हो रही थी।
पिसी माँ को उतरने-चढ़ने में कष्ट होता था, इसलिए नीचे कम आती थीं, पर बच्चों की नाक लाल हो रही थी, नाक से श्लेष्मा निर्गत हो रहा था। छूकर देखा तो आँचल से नाक पोंछते हुए उन्होंने गोस्वामी को पुकारा। रोते-रोते उनसे कहने लगीं-‘तूने यह क्या किया ?’ ठण्डे जल से स्नान कराकर बच्चों को बीमार कर दिया। गोस्वामी को विश्वास न हुआ तो माँ ने अपने आँचल का दूसरा कोना गौर की नाक के नीचे लगाकर कहा-‘बेटा सिनक तो।’ उसी समय श्लेष्मा फिर नाक से निकल पड़ा। उसकी अलौकिक गन्ध से मन्दिर महक उठा। गोस्वामी माँ के चरणों में गिर पडे़।
पिसी माँ के लाड़-प्यार के कारण उनके बालक कुछ ढीट हो गये थे। कुछ भी उनकी इच्छा के विरुद्ध होता तो वह रुष्ट हो जाते।
पूर्णिमा के दिन निताई-गौर बाहर बरामदे में विलास करते थे। उस दिन पूर्णिमा थी। गोपेश्वर संध्या के समय बाहर बरामदे के दीपक बुझाकर कि तेल ज़्यादा ख़र्च होगा कहीं चले गये और निताई-गौर को बाहर बरामदे में निकालना भूल गये। पिसी माँ बाहर बैठी नाम-जप कर रहीं थीं, एकाएक ज़ोर का शब्द हुआ। मन्दिर में अंधकार छा गया। गौर ने मन्दिर के भीतर पीतल की एक बड़ी दीवट जिस पर एक बत्ती का धृत दीपक जल रहा था, उठाकर फेंक दिया था। माँ उनके रोष का कारण समझ गईं। जब गोपेश्वर गोस्वामी वापिस आए तो माँ ने कहा-‘‘गोपेश्वर! तू आज निताई-गौर को बरामदे में नहीं लाया। दस बत्तियों वाला दीपक भी बुझ गया। देख! गौर गुस्से में दीपक फेंक फाँककर अंधेरे में बैठा है, जाकर उसे मना।’’
पिसी माँ की अवस्था 106 वर्ष की हो गयी थीं। उन्होंने गोपेश्वर गोस्वामी से कहा कि वे अमुक दिन देह त्याग देंगी। उसी दिन पूर्ण स्वस्थावस्था में मन्दिर के बरामदे में बैठीं और नाम-जप करते-करते, गौर-निताई के सुन्दर चन्द्रवदनों का दर्शन करते-करते उन्होंने पार्थिव शरीर त्यागकर नित्य लीला में प्रवेश किया।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।

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