Spirtual Awareness

दुर्गी माँ (Durgi Maa)

Devotee of Lord Krishna

दुर्गी माँ और उनका लाड़ला बेटा श्री विग्रहरूपी ‘गोपाल‘ रंगजी के मन्दिर के एक बाहरी कक्ष में रहने लगे थे। दोनों उस एकान्त स्थान को प्राप्त कर बहुत प्रसन्न थे। दोनों की प्रेम लीला वहाँ निरन्तर चलती थी। दुर्गी माँ का सारा प्रेम सिमट कर गोपाल के नन्हें चरणों में समा गया था और उसकी सेवा के सिवा वे और कुछ नहीं जानती थीं। उनका सर्वस्व गोपाल था और वे गोपाल की सर्वस्व थीं।

दुर्गी माँ बहुत बूढ़ी हो चुकी थीं, एक दिन उन्होंने गोपाल से कहा- ‘गोपाल अब मुझसे तेरी सेवा नहीं होती, तू मेरी सेवा किया कर’। गोपाल को और क्या चाहिए था। वह प्रेम से माँ की सेवा करने लगे। एक बार माँ की अनन्य भक्ता श्यामादेवी उनसे मिलने आईं और घर देखकर बोलीं- ‘माँ! पहले तुम्हारा घर जितना गन्दा रहता था, उतना ही अब साफ़ रहने लगा है। कौन सफ़ाई करता है? दुर्गी माँ ने सरल शब्दों में कहा- ‘‘मेरे पास और है ही कौन गोपाल के सिवा?’ श्यामादेवी, दुर्गी माँ और उनके बेटे गोपाल के अलौकिक प्रेम को देखकर आनन्दित हो गयीं।

एक दिन दुर्गी माँ गोपाल से बोलीं- ‘‘आज तेरे भोग के लिए मेरे पास कुछ नहीं है, तू किसी गोपी के घर भोजन कर आ’’। गोपाल ने माँ की आज्ञा का पालन किया और न जाने किस गोपी को धन्य किया। जब खा-पीकर गोपाल लौटा तो बाहर बरामदे में बैठ गया। भीतर कक्ष में दुर्गी माँ उसकी प्रतीक्षा में आँसू बहाती रहीं। इतने में ही मन्दिर के महन्त की पत्नी वहाँ आईं। उन्होंने देखा कि दुर्गी माँ के कक्ष का दरवाज़ा बंद है और बाहर पालने में गोपाल झूला झूल रहा है। उन्होंने दरवाजे़ को धीरे से धक्का दिया तो वह खुल गया। देखा कि दुर्गी माँ ध्यान में बैठी हैं और उनके नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित हो रही है। उन्होंने कहा- ‘‘माँ आज गोपाल को बाहर क्यों निकाल दिया?’’

‘क्या वह आ गया ?’ कहती हुई दुर्गी माँ भागकर बाहर आईं और गोपाल को अपने सीने से चिपटा लिया। माँ और बेटे दोनों को अपूर्व सुख का अनुभव हुआ। गोपाल अक्सर ही माँ को इस प्रकार खिजाया करता।

 

एक बार दुर्गी माँ ने गोपाल के साथ गोवर्धन की परिक्रमा की। सिर के ऊपर पोटली में गोपाल को लिटा लिया और थोड़ी-थोड़ी देर बाद वह पोटली उतार कर देख लेतीं कि गोपाल कहीं चला तो नहीं गया, क्योंकि गोपाल बहुत चंचल था। जब वे लौटीं तो सिर से पोटली उतारकर अपने कक्ष का ताला खोलने लगीं पर ताला न खुला। तब विश्राम करने के लिए वहीं बरामदे में बैठ गईं। पोटली खोली तो देखा कि गोपाल नहीं हैं, वे चीख- चीखकर रोने लगीं। तभी वहाँ मनोहरदास बाबा जी आ गये। उन्होंने ज्यों ही ताला खोलने का प्रयास किया तो ताला खुल गया। भीतर देखा तो गापेाल पालने में सो रहा था। उन्होनें कहा- ‘‘माँ तुम्हारा गोपाल तो भीतर सो रहा है, तुम व्यर्थ दुःखी हो रही हो’।

 

दुर्गी माँ आनन्द के साथ कुछ रोष में भीतर आईं, गोपाल को डाँटती-डपटती, पर उसे गहरी नींद में सोते देख चुप रह गईं। गोपाल मन ही मन दुर्गी माँ की खीज का आनन्द लेता रहा।

 

दुर्गी माँ का सांसारिक जीवन परिचय

 

दुर्गी माँ का जन्म कश्मीर के सिदड़े ग्राम में एक सुनार परिवार में हुआ था। 8 वर्ष की आयु में माँ का निधन होने पर पिता, पुत्री को लेकर तीर्थ यात्रा के लिए निकल गए। एक वर्ष बाद लौटे तो इन्हें ननिहाल में अच्छी परवरिश के लिए भेज दिया। दुर्गी बाई नानी के लाड़-प्यार में पलने लगीं। नानी के साथ ठाकुर जी की सेवा में हाथ बटातीं और उनका अनुकरण कर घण्टों नाम-जप करतीं। 13 वर्ष की आयु में विवाह हुआ ससुराल में सबका स्वभाव बड़ा तीखा था। दुर्गी बाई घर के लोगों को प्रसन्न रखने की चेष्टा करतीं, सबकी छोटी-बड़ी सेवा का ध्यान रखतीं और रात में भजन-साधना में लग जातीं पर यह बात उनके पति को न सुहाती और वे उनके साथ बड़ा ही कठोर व्यवहार करते। परिणामस्वरूप दुर्गी बाई की चित्तवृत्ति अन्तर्मुखी रहने लगी। वृत्ति जितनी अन्तर्मुखी होती गयी, उतना ही दुर्गी बाई का भगवद् भाव तीव्र होता गया। कभी-कभी काम करते समय वह भावसमाधि में डूब जातीं, तब वह क्षण उनके लिए और भी कठोर बनकर आते। उनके ऊपर गालियों और लात-घूसों की बरसात होने लगती। इस प्रकार दुर्गी माँ के जीवन के 17 वर्ष बीत गए। उन्होंने सात बच्चों को जन्म दिया। फिर एक दिन इस नारकीय जीवन को त्यागकर घर से निकल गईं।

बहुत कष्ट उठाते हुए देहरादून पहुँची और एक घर में दो वर्ष तक रसोई बनाने का काम करती रहीं। जब ये बात इनके पति को मालूम पड़ गई तो वहाँ से जो पहली गाड़ी मिली उस पर बैठकर लाहौर पहुँच गईं। लाहौर में भी दो वर्ष रहीं फिर हरिद्वार आ गईं और एक धर्मशाला में रहकर स्कूल में लड़कियों को घर से लाने और वापिस पहुँचाने की नौकरी में दुर्गी माँ को भजन के लिए पर्याप्त समय मिलने लगा। कभी-कभी तो पूरा दिन धर्मशाला का कमरा बंद ही रहता और दुर्गी माँ साधन-भजन में निमग्न रहने लगीं। दस वर्ष इसी प्रकार हरिद्वार में रहकर फिर दुर्गी माँ वृन्दावन चली आयीं। वृन्दावन में श्रीमच्छ्री स्वामीजी से दीक्षा लेकर गोपाल जी की सेवा करने लगीं। जीविका के लिए पहले तो दुर्गी माँ ने भगवान् भजनाश्रम का सहारा लिया, जहाँ आठ घण्टे कीर्तन करतीं और उसके बदले जो मिलता उससे गोपाल और अपना काम चलातीं। फिर कुछ समय बाद उन्होंने यह भी छोड़ दिया, क्योंकि उन्हें भगवान् के भजन से जीविका अर्जन करना सहन न हुआ। तत्पश्चात् रसिक बिहारी जी के मन्दिर की एक सेठानी के घर 5 रुपये प्रति महीने की नौकरी कर ली।

समय के साथ उनका भजन में इतना मन लगने लगा कि यह नौकरी कर पाना भी उनके लिए संभव न रहा। तभी से वह रंगजी के मन्दिर में एक एकान्त कक्ष में अपने लाड़ले गोपाल के साथ रहने लगीं और उनकी सेवा करने लगीं। दुर्गी माँ यथा संभव अपने को छिपाकर रखतीं और सबसे प्रभु दर्शन और वृन्दावनवास की भिक्षा माँगतीं, परन्तु कुछ लोग उन्हें जान गए थे। वे उनकी सेवा करते रहते, उसी से दुर्गी माँ का काम चल जाता। यदि अधिक मिल जाता तो दुर्गी माँ उसे संतों की सेवा में ख़र्च कर देतीं। संचय करने का तो सवाल ही नहीं था।

गोपाल को आवश्यकता होती तो गोपाल किसी न किसी को प्रेरणा देकर उसे जुटा लेते। एक बार माँ को चमेली के तेल की आवश्यकता थी। बहुत खुश्की हो गई थी। तब गोपाल ने अमृतसर के एक भक्त श्रीगिरधारी लाल के भीतर प्रेरणा डाल दी। उन्होंने अपने सेवक को एक शीशी सरसों का तेल लाने को कहा, वह ग़लती से चमेली का तेल लेकर आ गया। गिरधारी लाल को उस दिन वृन्दावन आना था और गाड़ी का समय हो गया था। वह तेल की शीशी ये सोचकर साथ ले आए कि दुर्गी माँ के काम आ जायेगी। जैसे ही माँ के पास पहुँचे, दुर्गी माँ बोलीं- ‘‘गिरधारी चमेली का तेल लाया है? ज़रा उसे मेरे सिर में डाल दे’’। गिरधारी ने अपने हाथ से उनके सिर में तेल डाला और यह देखकर आश्चर्यचकित हो गए कि दुर्गी माँ के सिर ने तेल की पूरी शीशी सोख ली।

यमुना में स्नान करते समय दुर्गी माँ को अक्सर लीला उद्दीपन हो जाता और वह घण्टों ध्यानमग्न अवस्था में जल में ही खड़ीं रह जातीं। कछुए काट जाते तो भी उन्हें पता नहीं चलता। बेसुध अवस्था में रास्ते पर चलतीं तो कई बार पागल कुत्ते उन्हें काट लेते। वह कोई उपचार न करतीं, सिर्फ यमुना-मिट्टी घावों पर लगा लेतीं, जिससे वह घाव ठीक हो जाता।

दुर्गी माँ पर जो भगवत् कृपा थी उसका एकमात्र कारण था उनका अति सरल, निराभिमानी, निष्कपट व्यक्तित्व और भगवन्नाम कीर्तन में अनन्य निष्ठा। उनके कक्ष के बाहर प्रायः दो ध्वनियाँ स्पष्ट सुनाई पड़ती थीं। एक तो होती स्वयं दुर्गी माँ की परिचित ध्वनि और दूसरी आकर्षक ध्वनि गोपाल के सिवा और किसकी हो सकती थी’?

‘‘कैसा मधुर होता होगा भक्त और भगवान् का दिव्य संकीर्तन।’’ जब वह गोपाल से एकान्त में बातें करतीं तो भक्त प्रायः सुन लिया करते। एक बार वे गोपाल से कह रही थीं- ’’गोपाल सुन तो मुझे नाम की ध्वनि आ रही है, मेरे रोम-रोम से नाम की ध्वनि निकल रही है।’’

दुर्गी माँ कभी अपने अनुभवों के सम्बन्ध में कुछ नहीं कहती थीं पर एक बार अपने एक अनन्य भक्त को उन्होंने कहा- ‘‘मुझे चमचमाते वृन्दावन के तीन बार दशर्न हुए हैं।’’ उनके जीवन के शेष दिनों में तो वह हर समय दिव्य वृन्दावन में ही निवास करती थीं। एक दिन श्यामादेवी ने उनके कक्ष में प्रवेश किया तो दुर्गी माँ उन्हें सावधान करके बोलीं- ‘‘धीरे! धीरे! इधर से।’’ श्यामादेवी ने चैंककर पूछा- ‘‘क्या बात है माँ’’? दुर्गी माँ बोलीं- ‘‘देखो न, इधर कमल खिल रहे हैं।’’ श्यामादेवी को कोई कमल नहीं दिखे पर वह जानती थीं कि दुर्गी माँ की दृष्टि एकदम ठीक है, क्योंकि वे हर समय दिव्य वृन्दावन में ही रहती थीं। दुर्गी माँ को अब हर वस्तु में, हर जगह उनके ठाकुर जी और ठाकुर जी का धाम ही दीखता था, और कुछ नहीं।

दुर्गी माँ के शेष जीवन में उनकी भाव मुद्रा से लगता था कि उनका दिव्य वृन्दावन से सम्बन्ध घनिष्ठ होता जा रहा है और प्राकृत वृन्दावन उनसे छूटता जा रहा है। 5 अगस्त सन् 1977 को 119 वर्ष की अवस्था में वह अपने प्राकृतिक देह को छोड़कर गोपी देह से सदा के लिए दिव्य वृन्दावन में प्रवेश कर गयीं।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।

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